Nibhana Bhul Jaata Hun

From time to time I go back to this poem by Dushyant Kumar sahab &, chotta muh badi baat, but I added a few lines to it because the “farishta hun sach batata hun” always made me feel like the poem is ending on a note that leaves words that he wanted to say but wouldn’t. And instead decided to end it on a happy note, while it being a melancholic poem. So, (again, chotta muh badi baat!) but I wanted to add to the pain that the poem conveys with words that I feel give it closure while keeping the desire and the wait intact. (just like how life should be; a comma, & not a full stop):

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है

मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है

मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे

और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में

आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा

मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

-Dushyant Kumar sahab

(my lines):

तुझे पाने की कोशिश में

खुद को भूल जाता हूँ

तेरे ख़्वाहिशों के बोझ में

दबता चला जाता हूँ

तेरा ख़ंजर सीने में लिए

फिर भी मुस्कुराता हूँ

हर बार ना सुनता हूँ

फिर भी लौट आता हूँ

अजनबी बनके रहना है अगर

तो वो रिश्ता भी निभाता हूँ

पर कभी कभी रात के सूनेपन में

निभाना भूल जाता हूँ

-Munch

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