आओ एक कहानी सुनाओ,
वही सुनाओ जो रोज़ सुनाते थे —
सब्र की, इंतज़ार की,
हौसले की, गुंजाइश की।
उन सपनों की जो आपकी आँखों में रौशनी भर देते थे।
उसमें एक चाह थी, एक जुनून था,
कुछ कर गुज़रने का संकल्प था — पर सुकून था।
रोज़मर्रा की कहानियाँ थीं:
पान वाले की परेशानियाँ, गली की दिक्कतें,
वर्कर्स का बड़े नेता पर ग़ुस्सा,
हर इंसान का बिना माँगे ज्ञान देना —
जैसे आज पूरी पार्टी इस ही चाय पर सुधार देंगे।
और एक दर्द था:
दर्द उन बातों का जो कभी कही नहीं,
बस एक परिवार की तरह महसूस की।
वो थकान सालों की,
जो भूल गई है जीत क्या होती है।
वो इंतज़ार सालों का,
जो अब कुछ अच्छा होने लगे तो भी डरता है और यक़ीन नहीं करता।
वो किस्से जो हर बार ऐसे सुनते थे जैसे पहली बार सुन रहे हों।
बस… वही कहानी फिर से सुननी है।